उत्तर प्रदेश में खेतों में पैदा होने वाले कई कृषि उत्पाद अब केवल कच्चे माल के रूप में बाजार तक सीमित नहीं रह रहे हैं। उन्हें साफ करने, छांटने, पैक करने और उनसे तैयार खाद्य उत्पाद बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसी बदलाव में प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्यम उन्नयन योजना यानी PMFME की अहम भूमिका है।
इस योजना का मकसद छोटे खाद्य कारोबारों को वित्तीय मदद, प्रशिक्षण और कारोबार से जुड़ा सहयोग देकर मजबूत करना है। उत्तर प्रदेश में इसे जिले के खास उत्पादों यानी One District One Product (ODOP) के साथ जोड़कर स्थानीय उत्पादों को बेहतर बाजार दिलाने की कोशिश की जा रही है।
PMFME योजना क्या है और इसका मकसद क्या है
PMFME का पूरा नाम प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्यम उन्नयन योजना है। केंद्र सरकार के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की यह योजना छोटे खाद्य प्रसंस्करण कारोबारों को आगे बढ़ाने के लिए शुरू की गई थी। योजना के तहत नए और मौजूदा सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों को वित्तीय, तकनीकी और कारोबार से जुड़ी मदद दी जाती है। योजना को 2025-26 तक बढ़ाया गया है और इसका कुल बजट 10,000 करोड़ रुपये है।
इसका सीधा मतलब यह है कि किसान या छोटा कारोबारी केवल कच्चा कृषि उत्पाद बेचने के बजाय उसे किसी तैयार या ज्यादा उपयोगी खाद्य उत्पाद में बदलने की दिशा में काम कर सकता है। इससे उत्पाद की कीमत बढ़ाने, उसकी पैकिंग सुधारने और उसे बड़े बाजार तक पहुंचाने की संभावना बनती है।
PMFME योजना में One District One Product यानी ODOP को खास महत्व दिया गया है। इसका उद्देश्य जिले में उपलब्ध खास कृषि या खाद्य उत्पाद के आसपास कारोबार और प्रसंस्करण की गतिविधियों को बढ़ावा देना है।
यूपी के जिलों के खास उत्पादों को मिला है एक अलग बाजार
उत्तर प्रदेश में ODOP कार्यक्रम के तहत अलग-अलग जिलों के खास उत्पादों की पहचान की गई है। इनमें कई कृषि और खाद्य उत्पाद भी शामिल हैं। सरकारी ODOP पोर्टल पर जिले के अनुसार खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े उत्पादों में अयोध्या का गुड़, कौशांबी का केला, कुशीनगर के केले और केले से बने उत्पाद, प्रतापगढ़ के आंवला उत्पाद, सिद्धार्थनगर का काला नमक चावल और मुजफ्फरनगर का गुड़ जैसे उत्पाद दर्ज हैं।
इस व्यवस्था में केवल उत्पाद पैदा करना ही लक्ष्य नहीं है। उसके बाद की पूरी प्रक्रिया पर भी ध्यान दिया जाता है। यानी स्थानीय कच्चे माल को प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार से जोड़ने की कोशिश की जाती है।
उदाहरण के लिए, केले को केवल ताजा फल के रूप में बेचने के बजाय उससे चिप्स या दूसरे मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इसी तरह आंवले को अलग-अलग खाद्य उत्पादों में बदलकर लंबे समय तक बाजार में रखा जा सकता है। सरकारी ODOP पोर्टल पर कौशांबी में केला प्रसंस्करण और प्रतापगढ़ में आंवला प्रसंस्करण से जुड़े उदाहरण भी दर्ज हैं।
PMFME से छोटे कारोबारियों को किस तरह मदद मिलती है
PMFME का सबसे अहम हिस्सा छोटे खाद्य प्रसंस्करण कारोबार को आर्थिक मदद देना है। पात्र व्यक्तिगत सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों के लिए योजना में योग्य परियोजना लागत का 35 प्रतिशत तक क्रेडिट-लिंक्ड सहायता का प्रावधान है, जिसकी अधिकतम सीमा 10 लाख रुपये प्रति इकाई है। यह सहायता बैंक से मंजूर परियोजना और ऋण से जुड़ी होती है, इसलिए इसे सीधे नकद भुगतान के रूप में समझना सही नहीं होगा।
योजना में केवल व्यक्तिगत इकाइयों पर ही ध्यान नहीं दिया गया है। किसान उत्पादक संगठन यानी FPO, स्वयं सहायता समूह यानी SHG और सहकारी संस्थाओं जैसे समूहों को भी खाद्य प्रसंस्करण से जुड़ी गतिविधियों में सहायता मिल सकती है। साझा सुविधाओं के लिए भी योजना में सहायता का प्रावधान है।
छोटे कारोबार के लिए योजना के प्रमुख सहारे इस तरह समझे जा सकते हैं:
- योग्य सूक्ष्म खाद्य इकाई को 35 प्रतिशत तक क्रेडिट-लिंक्ड सहायता मिल सकती है, जिसकी अधिकतम सीमा 10 लाख रुपये प्रति इकाई है।
- समूहों के लिए साझा खाद्य प्रसंस्करण सुविधाओं को विकसित करने में सहायता का प्रावधान है।
- स्वयं सहायता समूहों के सदस्यों के लिए बीज पूंजी के रूप में 40,000 रुपये तक की सहायता का प्रावधान है।
- प्रशिक्षण, क्षमता बढ़ाने, ब्रांडिंग और मार्केटिंग में भी योजना के तहत सहायता दी जाती है।
खेत से तैयार उत्पाद तक कैसे बदलती है पूरी तस्वीर
कृषि उत्पाद की असली कमाई केवल खेत में उत्पादन से तय नहीं होती। वह इस बात पर भी निर्भर करती है कि फसल कटने के बाद उसका कितना हिस्सा सुरक्षित रहता है, उसे किस तरह तैयार किया जाता है और वह ग्राहक तक किस रूप में पहुंचता है।
PMFME इसी हिस्से को मजबूत करने पर ध्यान देता है। सरकार के अनुसार योजना का उद्देश्य खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को वित्तीय और तकनीकी सहायता देने के साथ उन्हें संगठित आपूर्ति व्यवस्था, पैकेजिंग, भंडारण, मार्केटिंग और दूसरी जरूरी सेवाओं से जोड़ना भी है।
इसे एक आसान उदाहरण से समझें। किसी जिले में बड़ी मात्रा में केला पैदा होता है। किसान के सामने केवल ताजा केला बेचने का विकल्प हो तो उसे जल्दी बिक्री करनी पड़ सकती है। लेकिन स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण की सुविधा मिलने पर उसी उत्पादन से दूसरे खाद्य उत्पाद बनाए जा सकते हैं। इससे कारोबार के लिए नए रास्ते खुलते हैं और स्थानीय उत्पाद को एक पहचान मिल सकती है।
यही सोच यूपी के ODOP मॉडल से भी जुड़ती है। राज्य का ODOP कार्यक्रम जिलों के खास उत्पादों को विकसित करने, उनकी गुणवत्ता सुधारने, बाजार उपलब्ध कराने और स्थानीय कारोबार को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।
यूपी में PMFME का असर आंकड़ों में भी दिख रहा है
PMFME के तहत उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को सहायता मंजूर हुई है। 31 दिसंबर 2025 तक के केंद्रीय आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में 22,060 सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों को सहायता मंजूर की गई थी और स्वीकृत सब्सिडी की राशि 803.30 करोड़ रुपये थी।
इससे यह साफ होता है कि योजना का इस्तेमाल केवल कुछ चुनिंदा कारोबारों तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े कृषि राज्य में छोटे खाद्य कारोबारों के लिए इसका दायरा काफी बड़ा है।
जुलाई 2025 तक उपलब्ध एक अन्य सरकारी आंकड़े में उत्तर प्रदेश के लिए 17,818 क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी आवेदन मंजूर होने और 645.88 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत होने की जानकारी दी गई थी। उसी आंकड़े में 8,571 स्वयं सहायता समूह सदस्यों के लिए 25.97 करोड़ रुपये की बीज पूंजी और 14 इनक्यूबेशन केंद्रों की मंजूरी का भी उल्लेख था। बाद के आंकड़ों में राज्य की कुल स्वीकृत इकाइयों की संख्या और बढ़ी।
ब्रांडिंग और पैकेजिंग से स्थानीय उत्पाद को मिलती है पहचान
किसी कृषि उत्पाद को बाजार में जगह बनाने के लिए केवल अच्छी गुणवत्ता काफी नहीं होती। ग्राहक को उत्पाद के बारे में जानकारी देने वाली पैकेजिंग, सही लेबल और एक पहचान भी जरूरी होती है। PMFME में ब्रांडिंग और मार्केटिंग को भी सहायता के दायरे में रखा गया है। समूहों के लिए ब्रांडिंग और मार्केटिंग सहायता के तहत 50 प्रतिशत वित्तीय अनुदान का प्रावधान है।
इसका महत्व खास तौर पर उन स्थानीय उत्पादों के लिए है जो लंबे समय से किसी जिले या क्षेत्र में बनते रहे हैं, लेकिन बड़े बाजार तक नहीं पहुंच पाए। बेहतर पैकिंग और ब्रांडिंग के जरिए ऐसे उत्पाद स्थानीय बाजार से आगे दूसरे शहरों और बाजारों तक पहुंचने की क्षमता हासिल कर सकते हैं।
यूपी के ODOP कार्यक्रम में भी उत्पादों की मार्केटिंग और उन्हें बड़े बाजार से जोड़ने पर जोर दिया जाता है। राज्य के आधिकारिक ODOP पोर्टल पर जिलावार उत्पादों के साथ सप्लायर, निर्माता और निर्यातक से जुड़ी जानकारी तथा साझा सुविधा केंद्रों की जानकारी भी उपलब्ध है।
योजना का लाभ सिर्फ मशीन खरीदने तक सीमित नहीं
PMFME को केवल सब्सिडी या बैंक ऋण की योजना समझना अधूरा होगा। इसके तहत खाद्य प्रसंस्करण कारोबार को औपचारिक बनाने, प्रशिक्षण देने और जरूरी तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराने पर भी जोर है। सरकार ने बताया है कि योजना के तहत उद्यमियों को Udyam और FSSAI जैसे जरूरी पंजीकरण तथा खाद्य सुरक्षा से जुड़ी प्रक्रियाओं में भी सहायता दी जाती है, जहां यह लागू हो।
इसका फायदा उस छोटे कारोबारी को मिल सकता है जो घर या गांव के स्तर पर कोई खाद्य उत्पाद बनाता है, लेकिन कारोबार को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने के लिए जरूरी जानकारी और साधन नहीं जुटा पाता।
हालांकि, योजना का लाभ नियमों और पात्रता के अनुसार ही मिलता है। 35 प्रतिशत सहायता को हर परियोजना के लिए तय नकद लाभ नहीं माना जा सकता। परियोजना की पात्र लागत, बैंक ऋण, स्वीकृति और योजना के नियमों के आधार पर सहायता तय होती है। इसलिए आवेदन करने से पहले मौजूदा सरकारी दिशा-निर्देश देखना जरूरी है।
यूपी के कृषि उत्पादों के लिए इसका बड़ा मतलब क्या है
उत्तर प्रदेश में कृषि उत्पादन का बड़ा आधार होने के कारण खाद्य प्रसंस्करण के लिए स्थानीय कच्चे माल की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। PMFME और ODOP का मेल इस उत्पादन को स्थानीय कारोबार, प्रसंस्करण और बाजार से जोड़ने का रास्ता देता है।
इससे एक तरफ छोटे कारोबार को औपचारिक और बेहतर तरीके से चलाने का अवसर मिलता है, तो दूसरी तरफ स्थानीय उत्पाद को जिले की पहचान से जोड़कर बाजार में पेश किया जा सकता है। सरकारी आंकड़ों में यूपी की हजारों सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को मंजूरी मिलना इस दिशा में बढ़ती गतिविधि को दिखाता है।
आने वाले समय में किसी उत्पाद की पहचान केवल इस बात से नहीं होगी कि वह किस जिले में पैदा होता है। उसकी गुणवत्ता, साफ-सफाई, पैकेजिंग, ब्रांड और बाजार तक पहुंच भी उतनी ही जरूरी होगी। PMFME इसी बदलाव को छोटे खाद्य कारोबारों के स्तर से आगे बढ़ाने की कोशिश करता है।
khet में पैदा होने वाली फसल को सीधे बेचने के बजाय उसे स्थानीय स्तर पर प्रसंस्कृत करके तैयार उत्पाद में बदलना किसानों और छोटे कारोबारियों के लिए नई संभावनाएं पैदा कर सकता है। PMFME योजना इसी पूरी कड़ी को मजबूत करने पर ध्यान देती है।
उत्तर प्रदेश में ODOP के साथ इसका जुड़ाव खास महत्व रखता है, क्योंकि राज्य के अलग-अलग जिलों के अपने खास कृषि और खाद्य उत्पाद हैं। केला, आंवला, गुड़ और काला नमक चावल जैसे उत्पादों को प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार से जोड़ने पर उनकी पहचान जिले से निकलकर बड़े बाजार तक पहुंच सकती है। इस तरह PMFME का लक्ष्य केवल एक छोटी खाद्य इकाई को मदद देना नहीं, बल्कि स्थानीय उत्पाद को खेत से बाजार तक एक मजबूत कारोबारी रास्ता देना है।