फसल की अच्छी बढ़वार के लिए केवल नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की पर्याप्त मात्रा ही काफी नहीं होती। पौधों को कई सूक्ष्म पोषक तत्व भी चाहिए, जिनकी कमी होने पर पत्तियों, जड़ों, नई बढ़वार और उत्पादन क्षमता पर असर पड़ सकता है। इसी संदर्भ में दयाल तेजॉन को माइक्रोन्यूट्रिएंट पोषण से जुड़े उत्पाद के रूप में देखा जाता है, जिसका मुख्य विचार कम मात्रा में सूक्ष्म पोषक तत्वों की आपूर्ति पर आधारित बताया जाता है।
दयाल तेजॉन में माइक्रोन्यूट्रिएंट पोषण की भूमिका
पौधों को जिंक, आयरन, मैंगनीज, कॉपर, बोरॉन और मोलिब्डेनम जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व बहुत कम मात्रा में चाहिए होते हैं, लेकिन इनकी भूमिका पौधे की सामान्य वृद्धि और कई जैविक प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण होती है। किसी एक पोषक तत्व की कमी होने पर पौधे की बढ़वार प्रभावित हो सकती है और कई बार पत्तियों पर विशेष प्रकार के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
माइक्रोन्यूट्रिएंट का मतलब यह नहीं है कि इनकी जरूरत कम महत्व की है। इसका अर्थ मुख्य रूप से पौधे को आवश्यक मात्रा की तुलना में इन तत्वों की कम मात्रा चाहिए होना है। इसलिए सूक्ष्म पोषक तत्वों का उपयोग संतुलित पोषण व्यवस्था के हिस्से के रूप में किया जाना चाहिए।
दयाल तेजॉन के संदर्भ में “Low Dose High Power” का अर्थ कम मात्रा में प्रभावी माइक्रोन्यूट्रिएंट पोषण देने की अवधारणा से जुड़ा है। हालांकि किसी उत्पाद की वास्तविक संरचना, पोषक तत्वों की मात्रा और अनुशंसित डोज उसके लेबल और निर्माता की जानकारी के अनुसार ही निर्धारित की जानी चाहिए।
फसल में माइक्रोन्यूट्रिएंट की कमी क्यों दिखाई देती है
लगातार एक ही खेत में खेती, असंतुलित उर्वरक उपयोग, मिट्टी का अनुपयुक्त पीएच, अधिक नमी या सूखे जैसी परिस्थितियां पौधों द्वारा पोषक तत्वों के अवशोषण को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में खेत में पर्याप्त पोषक तत्व मौजूद होने के बावजूद पौधा उन्हें प्रभावी ढंग से नहीं ले पाता।
कई बार किसान पत्तियों का रंग बदलने या पौधे की बढ़वार रुकने को केवल नाइट्रोजन की कमी मान लेते हैं। जबकि कुछ परिस्थितियों में समस्या सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी या उनकी उपलब्धता से भी संबंधित हो सकती है। इसलिए केवल लक्षण देखकर किसी एक तत्व की कमी तय करना हमेशा सही नहीं होता।
मिट्टी की जांच और फसल की स्थिति का मूल्यांकन पोषक तत्व प्रबंधन को अधिक सटीक बनाने में मदद करता है। यही वजह है कि माइक्रोन्यूट्रिएंट उत्पादों का इस्तेमाल भी फसल, मिट्टी और पोषण की वास्तविक जरूरत को ध्यान में रखकर करना बेहतर माना जाता है।
दयाल तेजॉन से जुड़े पोषण का मुख्य उद्देश्य
माइक्रोन्यूट्रिएंट आधारित पोषण का उद्देश्य पौधे को उन सूक्ष्म तत्वों की उपलब्धता में मदद करना है जिनकी आवश्यकता सामान्य वृद्धि और विकास के लिए होती है। यह किसी एक मुख्य उर्वरक का सीधा विकल्प नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि संतुलित पोषण कार्यक्रम का एक हिस्सा हो सकता है।
“सम्पूर्ण पोषण” जैसे शब्द को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी भी एक माइक्रोन्यूट्रिएंट उत्पाद से फसल की सभी पोषण संबंधी जरूरतें पूरी होना जरूरी नहीं है। पौधे को मुख्य पोषक तत्वों के साथ-साथ आवश्यकतानुसार द्वितीयक और सूक्ष्म पोषक तत्व भी चाहिए होते हैं।
माइक्रोन्यूट्रिएंट प्रबंधन में मुख्य रूप से इन बातों पर ध्यान दिया जाता है:
- फसल में आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता
- मिट्टी में पोषक तत्वों की स्थिति और उपलब्धता
- पौधे की अवस्था और दिखाई देने वाले पोषण संबंधी लक्षण
- फसल की जरूरत के अनुसार संतुलित पोषण व्यवस्था
Low Dose High Power को किसान कैसे समझें
“Low Dose High Power” किसी भी कृषि उत्पाद के लिए अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि अधिक मात्रा में इस्तेमाल करने से बेहतर परिणाम मिलेगा। माइक्रोन्यूट्रिएंट के मामले में सही मात्रा विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि पौधों को इन तत्वों की आवश्यकता बहुत कम मात्रा में होती है।
इसलिए दयाल तेजॉन का इस्तेमाल करते समय उत्पाद के पैक पर दी गई फसलवार मात्रा, प्रयोग की विधि और अन्य निर्देशों को प्राथमिकता देना जरूरी है। अनुमान से मात्रा बढ़ाना या घटाना उचित नहीं माना जाना चाहिए।
खास तौर पर अलग-अलग फसलों की पोषण आवश्यकता अलग होती है। धान, गेहूं, गन्ना, सब्जियों, दलहनी फसलों और बागवानी फसलों के लिए पोषण प्रबंधन एक जैसा नहीं होता। इसी कारण किसी एक फसल में उपयोग की जाने वाली मात्रा को दूसरी फसल में सीधे लागू नहीं करना चाहिए।
माइक्रोन्यूट्रिएंट का इस्तेमाल करते समय किन बातों का ध्यान रखें
माइक्रोन्यूट्रिएंट उत्पादों का सही उपयोग केवल उत्पाद की मात्रा पर निर्भर नहीं करता। पानी की गुणवत्ता, मिट्टी की स्थिति, फसल की अवस्था, दूसरे उर्वरकों का इस्तेमाल और मौसम जैसी परिस्थितियां भी पोषक तत्वों की उपलब्धता और पौधे की प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं।
किसान को किसी भी उत्पाद को दूसरे कृषि इनपुट के साथ मिलाने से पहले उसके लेबल पर दिए गए निर्देशों की जांच करनी चाहिए। बिना पुष्टि के अलग-अलग उत्पादों को एक ही टैंक में मिलाना उचित नहीं है।
इसी तरह यदि खेत में पत्तियों का रंग बदल रहा है, पौधे कमजोर दिखाई दे रहे हैं या बढ़वार असामान्य है, तो केवल लक्षण के आधार पर माइक्रोन्यूट्रिएंट का प्रयोग शुरू करने के बजाय समस्या के संभावित कारण की पहचान करना अधिक उपयोगी रहता है।
दयाल तेजॉन को लेकर किसानों के लिए जरूरी बात
दयाल तेजॉन को माइक्रोन्यूट्रिएंट पोषण से जुड़े उत्पाद के रूप में समझा जा सकता है, लेकिन इसके वास्तविक पोषक तत्वों, उनकी सांद्रता और फसलवार अनुशंसित मात्रा के बारे में सही जानकारी के लिए उत्पाद के वर्तमान लेबल को ही आधार बनाना चाहिए। उपलब्ध जानकारी के बिना किसी विशेष तत्व की मात्रा या निश्चित डोज बताना सही नहीं होगा।
कृषि में बेहतर परिणाम केवल किसी एक उत्पाद पर निर्भर नहीं करते। मिट्टी की स्थिति, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, सिंचाई, फसल की अवस्था और समय पर पोषण प्रबंधन सभी मिलकर फसल के विकास को प्रभावित करते हैं।
निष्कर्ष
दयाल तेजॉन का “Low Dose High Power” विचार माइक्रोन्यूट्रिएंट पोषण की उस जरूरत की ओर ध्यान दिलाता है जिसमें पौधों को कम मात्रा में आवश्यक सूक्ष्म तत्वों की आपूर्ति की जाती है। माइक्रोन्यूट्रिएंट भले ही कम मात्रा में चाहिए होते हैं, लेकिन पौधे की सामान्य वृद्धि और विकास में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
किसानों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि माइक्रोन्यूट्रिएंट का उपयोग जरूरत के अनुसार और निर्धारित मात्रा में किया जाए। उत्पाद की सही संरचना और डोज को लेकर अनुमान लगाने के बजाय पैक पर दी गई जानकारी तथा खेत की वास्तविक पोषण स्थिति को आधार बनाना बेहतर है। संतुलित पोषण व्यवस्था के साथ सही माइक्रोन्यूट्रिएंट प्रबंधन फसल की पोषण संबंधी जरूरतों को व्यवस्थित तरीके से पूरा करने में मदद कर सकता है।


