धान की फसल में सही समय पर किया गया पोषण प्रबंधन बालियों के विकास और दाना भरने की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण होता है। खासकर बालियां निकलने से पहले और बालियां बनने के आसपास फसल को संतुलित पोषण की जरूरत रहती है।
लेकिन पहली स्प्रे में हर खेत के लिए एक ही घोल डालना सही तरीका नहीं है। फसल की अवस्था, मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता और कमी के लक्षण देखकर ही स्प्रे का चुनाव करना चाहिए।
पहली स्प्रे कब करनी चाहिए
धान में पहली स्प्रे का समय केवल फसल की उम्र देखकर तय नहीं किया जाना चाहिए। कई किस्मों और अलग-अलग खेती प्रणालियों में पौधे की विकास गति अलग हो सकती है। इसलिए बालियां बनने की शुरुआत यानी पैनिकल इनिशिएशन और उसके आसपास की अवस्था को पहचानना ज्यादा उपयोगी है।
इस समय पौधे में आगे बनने वाली बाली और उसके दानों के लिए पोषक तत्वों की मांग बढ़ती है। धान में नाइट्रोजन की जरूरत को भी फसल की अवस्था के अनुसार बांटकर देना अधिक उचित माना जाता है। ICAR की कृषि सलाह में भी धान में नाइट्रोजन को अलग-अलग चरणों में देने और पैनिकल इनिशिएशन के आसपास पोषण पर ध्यान देने की सलाह दी गई है।
इसलिए किसान केवल यह देखकर कि फसल हरी दिखाई दे रही है, बिना जरूरत के कोई अतिरिक्त पोषक स्प्रे न करें। पहले यह देखें कि फसल किस अवस्था में है और खेत में किसी पोषक तत्व की कमी के लक्षण तो नहीं हैं।
पहली स्प्रे में क्या डालें
धान की पहली स्प्रे के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई एक निश्चित मिश्रण सभी खेतों के लिए जरूरी नहीं होता। यदि मिट्टी में पोषक तत्व पर्याप्त हैं तो अनावश्यक माइक्रोन्यूट्रिएंट या अन्य उत्पाद डालने से जरूरी नहीं कि बालियां लंबी या दाने मोटे हो जाएं।
जिंक की कमी धान में एक महत्वपूर्ण पोषण समस्या हो सकती है। इसकी कमी होने पर पत्तियों पर हल्के पीले या भूरे रंग के लक्षण दिखाई दे सकते हैं और पौधे की वृद्धि प्रभावित हो सकती है। ICAR के अनुसार जिंक की कमी की पुष्टि के लिए मिट्टी की जांच उपयोगी है और कमी वाले खेतों में जिंक प्रबंधन किया जाना चाहिए।
अगर खेत में जिंक की कमी है या पहले से इसकी कमी की पुष्टि हुई है, तो जिंक का प्रयोग स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह और उत्पाद के लेबल पर दिए निर्देश के अनुसार किया जा सकता है। जिंक की कमी वाले खेतों में मिट्टी के माध्यम से दिया गया जिंक कई परिस्थितियों में पत्तियों पर किए गए प्रयोग से अधिक प्रभावी हो सकता है।
लंबी बालियों और मोटे दानों के लिए क्या जरूरी है
लंबी बाली और अच्छी तरह भरे हुए दाने केवल एक स्प्रे पर निर्भर नहीं करते। पौधे की पूरी पोषण व्यवस्था, पर्याप्त नमी, स्वस्थ पत्तियां और सही समय पर खाद प्रबंधन मिलकर उपज की क्षमता को प्रभावित करते हैं।
पोटाश धान की पोषण व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और कई अनुशंसाओं में इसकी मात्रा का एक हिस्सा फसल की बाद की अवस्था में देने की व्यवस्था की जाती है। ICAR-Indian Institute of Rice Research की सामग्री में भी कुछ धान प्रणालियों में पोटाश के विभाजित प्रयोग और पैनिकल इनिशिएशन के आसपास पोषण प्रबंधन का उल्लेख मिलता है।
इसलिए केवल पत्तियों पर कोई घोल छिड़ककर लंबी बाली और मोटे दाने की गारंटी मानना सही नहीं है। यदि खेत में मुख्य पोषक तत्वों की कमी है, तो पहले संतुलित खाद प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए।
पहली स्प्रे के समय किसान इन बातों पर विशेष ध्यान रखें:
- फसल की अवस्था देखकर ही स्प्रे का समय तय करें।
- जिंक या अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व का प्रयोग कमी होने पर प्राथमिकता से करें।
- पोटाश और नाइट्रोजन की मात्रा खेत की सिफारिश और मिट्टी की स्थिति के अनुसार रखें।
- अलग-अलग उत्पादों को बिना उनकी संगतता और लेबल निर्देश जाने एक ही टैंक में न मिलाएं।
स्प्रे करते समय इन गलतियों से बचें
धान में स्प्रे का असर केवल दवा या पोषक तत्व पर निर्भर नहीं करता। गलत मात्रा, गलत समय या प्रतिकूल मौसम में किया गया छिड़काव फसल को नुकसान भी पहुंचा सकता है।
तेज धूप और बहुत गर्म परिस्थितियों में स्प्रे करने से बचना बेहतर रहता है। पत्तियों पर पोषक तत्वों के छिड़काव के लिए ऐसा समय चुनना चाहिए जब पौधे पर अनावश्यक तनाव न हो। यदि बारिश की संभावना हो तो स्प्रे का समय भी उसी के अनुसार तय करें।
इसके अलावा किसी भी कीटनाशक को केवल इसलिए न मिलाएं कि उससे बाली लंबी या दाने मोटे होंगे। कीटनाशक का प्रयोग कीट की वास्तविक उपस्थिति और अनुशंसित नियंत्रण व्यवस्था के अनुसार ही होना चाहिए। ICAR की सलाह भी धान में कीट और रोग नियंत्रण के लिए आवश्यकता के अनुसार पौध संरक्षण रसायनों के प्रयोग पर जोर देती है।
पानी और खाद का प्रबंधन भी उतना ही जरूरी
धान में बाली बनने से लेकर फूल आने और दाना भरने तक पानी की कमी फसल के लिए नुकसानदायक हो सकती है। इस अवधि में खेत को पानी की कमी के तनाव से बचाना जरूरी है। ICAR-IIRR की सामग्री में पैनिकल इनिशिएशन से लेकर ग्रेन फिलिंग तक पर्याप्त नमी बनाए रखने को महत्वपूर्ण बताया गया है।
इसी तरह केवल यूरिया बढ़ाते जाना भी सही रणनीति नहीं है। जरूरत से अधिक नाइट्रोजन देने पर पौधे की वृद्धि असंतुलित हो सकती है और खेत में रोग या कीट की समस्या बढ़ने की परिस्थितियां बन सकती हैं। संतुलित पोषण और मिट्टी की जांच के आधार पर खाद की मात्रा तय करना ज्यादा वैज्ञानिक तरीका है। ICAR-IIRR ने भी मिट्टी की जांच के आधार पर धान में पोषक तत्वों की जरूरत तय करने पर जोर दिया है।
पहली स्प्रे के बाद आगे क्या ध्यान रखें
पहली स्प्रे करने के बाद किसान को फसल की स्थिति लगातार देखते रहना चाहिए। यदि पत्तियां स्वस्थ हैं, पौधों में पर्याप्त बढ़वार है और किसी पोषक तत्व की कमी के स्पष्ट लक्षण नहीं हैं, तो बार-बार पोषक स्प्रे करने की जरूरत नहीं होती।
बाली निकलने के समय खेत में कीट और रोग की निगरानी भी जरूरी है। उदाहरण के लिए पैनिकल इनिशिएशन के आसपास कुछ रोगों के लिए मौसम अनुकूल होने पर विशेष निगरानी और जरूरत के अनुसार नियंत्रण की सलाह दी जाती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि “लंबी बालियां और मोटे दाने” किसी एक स्प्रे का निश्चित परिणाम नहीं हैं। अच्छी उपज के लिए सही किस्म, संतुलित पोषण, पर्याप्त नमी, स्वस्थ पौधों और समय पर कीट-रोग प्रबंधन का संयुक्त प्रभाव होता है।
निष्कर्ष
धान में पहली स्प्रे करते समय जल्दबाजी में कोई भी टॉनिक या पोषक मिश्रण डालने के बजाय फसल की अवस्था और खेत की वास्तविक जरूरत को समझना जरूरी है। बाली बनने की अवस्था में संतुलित पोषण विशेष महत्व रखता है और जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग मुख्य रूप से कमी की स्थिति में किया जाना चाहिए।
लंबी बालियां और अच्छी तरह भरे हुए मोटे दाने पाने के लिए केवल स्प्रे पर निर्भर रहने के बजाय खाद, पानी और फसल स्वास्थ्य का पूरा प्रबंधन करें। मिट्टी की जांच के आधार पर पोषक तत्वों की जरूरत तय करना और उत्पाद की निर्धारित मात्रा में ही उपयोग करना किसान के लिए ज्यादा सुरक्षित और प्रभावी तरीका है।


