धान की फसल में सही समय पर पोषक तत्वों की पूर्ति करने से पौधों की बढ़वार, बालियों के विकास और दाने बनने की प्रक्रिया बेहतर तरीके से चल सकती है। NPK 0:52:34 यानी मोनो पोटैशियम फॉस्फेट ऐसा पानी में घुलनशील उर्वरक है, जिसमें नाइट्रोजन नहीं होता, जबकि फास्फोरस और पोटाश की मात्रा अधिक होती है।
धान में इसका इस्तेमाल सामान्य खाद की तरह हर अवस्था में करना सही तरीका नहीं है। खासकर पत्तियों पर छिड़काव करते समय फसल की अवस्था, घोल की सांद्रता और मौसम का ध्यान रखना जरूरी है।
NPK 0:52:34 क्या है और धान में इसका काम क्या होता है
NPK 0:52:34 को मोनो पोटैशियम फॉस्फेट यानी MKP के नाम से भी जाना जाता है। इसके ग्रेड में 0 प्रतिशत नाइट्रोजन, 52 प्रतिशत फास्फोरस और 34 प्रतिशत पोटाश होता है। यह पानी में आसानी से घुलने वाला उर्वरक है और इसका इस्तेमाल पत्तियों पर छिड़काव तथा कुछ परिस्थितियों में सिंचाई के माध्यम से किया जा सकता है।
धान की फसल में फास्फोरस जड़ और पौधे के विकास से जुड़ा महत्वपूर्ण पोषक तत्व है, जबकि पोटाश पौधे की कई शारीरिक प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि 0:52:34 डालने से हर खेत में उत्पादन अपने आप बढ़ जाएगा। उर्वरक का फायदा तभी मिलता है जब फसल को वास्तव में संबंधित पोषक तत्वों की आवश्यकता हो और मात्रा सही रखी जाए।
धान की पोषण व्यवस्था सामान्य तौर पर मिट्टी की स्थिति और फसल की जरूरत के अनुसार करनी चाहिए। इसलिए 0:52:34 को बेसल खाद या नाइट्रोजन वाली खाद का सीधा विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
धान में NPK 0:52:34 कब डालें
NPK 0:52:34 के पत्तियों पर छिड़काव के लिए फसल की अवस्था सबसे महत्वपूर्ण बात है। उपलब्ध उत्पाद निर्देशों के अनुसार MKP का फोलियर इस्तेमाल बुवाई के लगभग 30 से 40 दिन बाद से लेकर फूल आने से पहले की अवस्था तक किया जा सकता है। सामान्य निर्देशों में 0.5 से 1 प्रतिशत घोल का उल्लेख मिलता है और आवश्यकता के अनुसार 10 से 15 दिन के अंतर पर 2 से 3 बार तक छिड़काव किया जा सकता है।
धान में इसे इस्तेमाल करने से पहले यह समझना जरूरी है कि खेत में फसल किस अवस्था में है। केवल यह देखकर छिड़काव नहीं करना चाहिए कि दूसरे किसान भी 0:52:34 डाल रहे हैं।
धान में पोषक तत्वों की मांग फसल की अवस्था के साथ बदलती रहती है। विशेष रूप से बालियां बनने की प्रक्रिया से पहले और दाने बनने की महत्वपूर्ण अवस्थाओं में संतुलित पोषण का महत्व बढ़ जाता है। लेकिन इन अवस्थाओं में भी 0:52:34 की जरूरत खेत की पोषण स्थिति और अपनाई जा रही खाद प्रबंधन योजना पर निर्भर करेगी।
0:52:34 का घोल कितनी मात्रा में बनाएं
फोलियर स्प्रे में 0:52:34 की मात्रा हमेशा उत्पाद के लेबल और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार तय करनी चाहिए। 0.5 प्रतिशत घोल का अर्थ 5 ग्राम उर्वरक प्रति लीटर पानी होता है, जबकि 1 प्रतिशत घोल का अर्थ 10 ग्राम प्रति लीटर पानी होता है।
इसलिए किसान को केवल उर्वरक का नाम देखकर ज्यादा मात्रा डालने से बचना चाहिए। अधिक मात्रा का मतलब यह नहीं है कि पौधे को उतना ही अधिक फायदा मिलेगा। पत्तियों पर किसी भी पानी में घुलनशील उर्वरक का छिड़काव करते समय सांद्रता बढ़ाने से पत्तियों पर नुकसान का जोखिम बढ़ सकता है।
धान में छिड़काव के लिए मुख्य बातों को इस तरह समझा जा सकता है:
- 0.5 प्रतिशत घोल के लिए 5 ग्राम 0:52:34 प्रति लीटर पानी लिया जाता है।
- 1 प्रतिशत घोल के लिए 10 ग्राम 0:52:34 प्रति लीटर पानी लिया जाता है।
- छिड़काव की पुनरावृत्ति फसल की जरूरत और उत्पाद के निर्देश के अनुसार रखनी चाहिए।
- तेज धूप, प्रतिकूल मौसम या तनावग्रस्त फसल पर बिना आवश्यकता के छिड़काव करने से बचना चाहिए।
धान में 0:52:34 डालते समय भूलकर भी न करें ये गलती
सबसे बड़ी गलती यह है कि किसान 0:52:34 को हर समस्या की एक ही दवा समझ लेते हैं। यह कीटनाशक या रोगनाशक नहीं है और न ही यह धान में नाइट्रोजन की कमी को पूरा कर सकता है। इसके ग्रेड में नाइट्रोजन शून्य है, इसलिए यदि फसल में नाइट्रोजन की कमी है तो केवल 0:52:34 का छिड़काव उस कमी का समाधान नहीं करेगा।
दूसरी गलती जरूरत से ज्यादा मात्रा का इस्तेमाल करना है। अधिक मात्रा डालने से पोषक तत्वों का फायदा बढ़ना जरूरी नहीं है। फोलियर स्प्रे में सही सांद्रता रखना महत्वपूर्ण है।
तीसरी सावधानी बिना जांच के दूसरे उर्वरकों या कृषि रसायनों के साथ टैंक मिक्सिंग करना है। अलग-अलग उत्पादों को मिलाने से पहले उनकी संगतता और लेबल निर्देशों की जांच करनी चाहिए। केवल इसलिए कई उत्पाद एक साथ नहीं मिलाने चाहिए क्योंकि सभी पानी में घुल जाते हैं।
चौथी गलती मौसम को नजरअंदाज करना है। पत्तियों पर किए जाने वाले पोषक तत्वों के छिड़काव में पौधे की स्थिति और मौसम दोनों महत्वपूर्ण होते हैं। बारिश की संभावना होने पर किया गया छिड़काव धुल सकता है और अत्यधिक गर्म या प्रतिकूल परिस्थितियों में पत्तियों पर नुकसान का जोखिम बढ़ सकता है।
धान में 0:52:34 और सामान्य खाद प्रबंधन में अंतर
धान की पूरी पोषण जरूरत केवल एक पानी में घुलने वाले उर्वरक से पूरी नहीं होती। धान में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की आवश्यकता फसल, मिट्टी, किस्म और स्थानीय कृषि परिस्थितियों के अनुसार बदल सकती है।
धान की पोषण व्यवस्था में मिट्टी परीक्षण आधारित सिफारिश को प्राथमिकता देना अधिक उचित है। कृषि विश्वविद्यालयों की अनुशंसाओं में भी धान में पोषक तत्वों की मात्रा को मिट्टी और फसल की स्थिति के अनुसार तय करने तथा नाइट्रोजन और पोटाश को अलग-अलग अवस्थाओं में देने की व्यवस्था बताई गई है।
0:52:34 का उपयोग मुख्य रूप से तब समझ में आता है जब फसल को फास्फोरस और पोटाश की उपलब्धता बढ़ाने की आवश्यकता हो और फोलियर पोषण की जरूरत हो। इसे सामान्य यूरिया, डीएपी या अन्य संतुलित उर्वरक का सीधा विकल्प समझना सही नहीं होगा।
छिड़काव से पहले इन बातों का रखें ध्यान
धान में किसी भी पानी में घुलने वाले उर्वरक का इस्तेमाल करने से पहले खेत की वास्तविक स्थिति देखना जरूरी है। यदि पौधे सामान्य रूप से विकसित हो रहे हैं और मिट्टी में पोषक तत्व पर्याप्त हैं, तो केवल उत्पादन बढ़ाने की उम्मीद में बार-बार स्प्रे करना उचित नहीं है।
यदि फसल में पोषक तत्वों की कमी के लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो केवल लक्षण देखकर अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय मिट्टी परीक्षण या कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर रहता है। कई बार पोषक तत्वों की कमी जैसे दिखने वाले लक्षण पानी की समस्या, जड़ संबंधी परेशानी या अन्य कारणों से भी हो सकते हैं।
छिड़काव करते समय घोल को पत्तियों पर समान रूप से पहुंचाना चाहिए। तेज हवा या बहुत गर्म मौसम में स्प्रे करने से बचना और उत्पाद के लेबल पर दिए सुरक्षा निर्देशों का पालन करना भी जरूरी है।
सही समय और सही मात्रा ही है 0:52:34 के इस्तेमाल की कुंजी
धान में NPK 0:52:34 का इस्तेमाल बिना सोचे-समझे करने के बजाय फसल की अवस्था और पोषक तत्वों की जरूरत देखकर करना चाहिए। फोलियर उपयोग के लिए सामान्य उत्पाद निर्देशों में 30 से 40 दिन बाद से प्री-फ्लावरिंग तक 0.5 से 1 प्रतिशत घोल का उल्लेख मिलता है, लेकिन स्थानीय कृषि सलाह और उत्पाद के लेबल को प्राथमिकता देना जरूरी है।
सबसे जरूरी बात यह है कि 0:52:34 को नाइट्रोजन वाली खाद का विकल्प न समझें और न ही अधिक मात्रा को अधिक फायदा मानें। सही अवस्था, सही सांद्रता, उचित मौसम और संतुलित पोषण प्रबंधन के साथ ही इस उर्वरक का उपयोग अधिक समझदारी से किया जा सकता है।


